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बेचारे _बटे _बटे _से _लड़के


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"आंखों में बार बार आंसू भर कोरों तक पहुंचता और बार बार उसे रोक लिया जाता गिरने से, मैंने इतने करीब से देखा एक लड़के को, हां रिश्ता ही कुछ ऐसा था, मेरे जीवन के पीड़ा दायक क्षणों में से एक!


बेचारे बटें बंटे से लड़के, कितने बेबस से हो जाते है, कभी दो बहनों में बंट जाते, झेलते दोनों की नाराज़गी, कभी बंट जाते अपनी प्रेमिका और अपने परिवार के बीच, कितनी यातनाओं को सहते अन्ततः छोड़ देते प्रेमिका का दामन अपने परिवार के खुशी के लिए


और नाम पाते बेवफ़ा का!


सबकुछ भूलकर फ़िर बंध जाते किसी अंजान अजनबी से स्त्री के संग आजीवन विवाह बंधन में, मात्र अपनों के खुशियों के लिए, और एकबार फिर बंट जाते अपने मां और पत्नी के मध्य, बेचारे पीस दिए जाते गेहूं के घुन की तरह!


असहाय से हो जाते बेचारे, खत्म हो जाता उनका अल्हड़पन, उचित समझने लगते वो मौन रहना, न रो पाए मन भर, न हंस पाए खिलखिलाकर, स्त्री की यातनाओं का उसकी पीड़ा का जिक्र किया जाता रहा है किंतु ये लड़के भी कहां आज़ाद रह पाते है, बेचारे बंट जाते फ़िर अपने गांव और बड़े शहर में, फ़िर अपने बच्चों में बंटते, और विवशता तो देखो, अंततः बांट दिया जाता एक पिता को अपने पुत्रों द्वारा वृद्धावस्था में!


सबको खुश रखने की होड़ में बेचारे कहीं न कहीं घोंट देते गला अपने खुशियों का, भुला देते अपने अरमान!


बेचारे लड़के आजीवन बंटे रहते, त्याग समर्पण की तिरोहित मूर्ति होते है ये लड़के! बहुत दुख होता जब तुम्हें असहाय और निर्बल सा देखती हूं, वो आंखों के कोरो में रुके अश्रुबिंदु हृदय विदारक से है!


सबसे समझदार होती है वो स्त्रियां जो बचा लेती अपने पति, अपने भाई, अपने पुत्र को बंटने से, आज़ाद रखती जो एक पुरुष के अल्हड़पन को, उन्मुक्त आनंद लेने देती जो लड़कों को उनके हिस्से का!


स्त्रियां जब टूटती है न तो वो विलाप करती है, क्रंदन करती है, असीम रूदन कर बहा देती अपने दर्द को अपने अश्रुओं में रूपांतरित कर, लेकिन जब मर्द टूटते है न तो वो अपने दर्द को समेट कर मौन हो जाते है, सारी पीड़ा सारी टूटन, सारी चुभन महसूस होती केवल और केवल उनके ही अंतर्मन को!


गर्व है अपने संस्कारों पर, हमे कभी किसी को विवश करना, किसी की मजबूरी, लाचारी, और बेबसी बनना नहीं सिखाया गया, और न ही किसी को बांटना!


किसी को कैद करना प्रेम नहीं, किसी को खुश देखना प्रेम है!


सुनो लड़कों.....


नमन है तुम्हारी समझदारी और सहनशीलता को!"


ये 

रचना सभी लड़कों को समर्पित!


सेक्स हर कोई करना लेकिन......


सेक्स हर कोई करना चहता है चाहे वह महिला हो या पुरुष।


कामुक बातें हर किसी को पसन्द हैं


हर कोई कामवासना में लिप्त है।


और होगा भी क्यों नहीं यह प्रकृति ने दिया है और स्वाभाविक प्रक्रिया है।


सहमति से सेक्स कोई गलत नहीं है और मैं सेक्स को आम क्रियाओं की तरह ही मानती हूं।


जो जीवन को, रूह कोआनंदित कर दे वह विषय खराब कैसे हो सकता है।


और फिर जिस विषय पर महर्षि वात्स्यान जैसे महान दार्शनिक ने कामसूत्र पुस्तक लिखी हो और विस्तार पूर्वक वर्णन किया हो बह विषय चर्चा के योग्य क्यों नहीं हो सकता वह विषय खराब कैसे हो सकता है


सेक्स को अच्छे से किया जाए तो फिर सेक्स सबसे ज्यादा आनंदित करने बाली क्रिया है।



लेकिन कुछ लोगऊपर से दिखावा ऐसा करेंगे जैसे सारे संस्कार सिर्फ इन्हीं में कूट कूट कर भर दिए हों।


जब कोई सेक्स की बातें करेगा तो बहुत ही संस्कार वान बनेंगे जैसे ये सेक्स करते ही न हों और यदि सच कहूं तो ऐसे ढोंगी लोग ही कामवासना में सबसे ज्यादा लिप्त हैं यही वो लोग हैं जो अकेले में हर रोज पोर्न वीडियो देखते हैं लेकिन सबके सामने बड़े ही मर्यादित बनेंगे।


सेक्स एक क्रिया है महान दार्शनिक रजनीश ओशो जी ने कहा है कि जिस प्रकार नहाना धोना,खाना पीना, सोना जागना, एक क्रिया ठीक वैसे ही सेक्स भी एक क्रिया ही है हालाकि ये सिर्फ महिला और पुरुष द्वारा एकांत में करने वाली क्रिया है।


लेकिन सेक्स से संबंधित जरूरी जानकारी पर खुलकर बात करने में कोई बुराई नहीं है।


इसलिए मैं तो सिर्फ सेक्स ही नहीं जिस विषय पर भी लिखती हूं खुलकर लिखती हूं।सेक्स पर लिखूंगी तो कोई बुराई ही तो देगा इससे ज्यादा और कोई क्या कर सकता है और बुराई तो वैसे भी सहज ही मिल जाती है अच्छे कामों में भी मिल जाती है बुराई तो फिर डर किस बात का।


✍️........#paidpost

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